आखिरकार क्यों कांग्रेस लाख कोशिश के बाद भी प्रदर्शन से नहीं छोड़ पाई असर: बीजेपी बोली एक जुटता की हकीकत ये है उंगली पर गिनने वाली भीड़

उत्तराखंड की राजधानी में सोमवार को राजनीतिक हलचल उस वक्त बढ़ गई जब प्रदेश कांग्रेस ने राजभवन घेराव का कार्यक्रम आयोजित किया। प्रदेशभर से कार्यकर्ताओं को देहरादून बुलाने की तैयारी कई दिनों से चल रही थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गणेश गोदियाल, प्रीतम सिंह, हरक सिंह रावत और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा समेत कई दिग्गज मौके पर मौजूद रहे। परेड ग्राउंड और उसके आसपास पार्टी समर्थकों की मौजूदगी जरूर नजर आई, लेकिन जिस व्यापक जनसैलाब की अपेक्षा की जा रही थी, वैसा दृश्य राजधानी में दिखाई नहीं दिया।

दावे बड़े, असर सीमित

कांग्रेस ने इसे प्रदेशस्तरीय शक्ति प्रदर्शन बताया और हजारों कार्यकर्ताओं की भागीदारी का दावा किया। कार्यक्रम स्थल पर झंडे-बैनर और नारेबाजी से माहौल राजनीतिक जरूर रहा, मगर शहर की रफ्तार पर इसका खास प्रभाव नहीं पड़ा। बाजार खुले रहे, ट्रैफिक सामान्य रहा और आम जनजीवन प्रभावित नहीं दिखा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि भीड़ उम्मीद के अनुरूप होती तो राजधानी का माहौल अलग ही तस्वीर पेश करता।

सूत्रों के मुताबिक, कार्यकर्ताओं को जुटाने के लिए संगठन को विशेष प्रयास करने पड़े। विधानसभा चुनाव से पहले यह कार्यक्रम संगठनात्मक मजबूती का संदेश देने का प्रयास माना जा रहा था, लेकिन भीड़ का आकार उस संदेश को उतनी ताकत से स्थापित नहीं कर सका।

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भाजपा का तंज: “भीतर से कमजोर कांग्रेस”

भाजपा ने इस प्रदर्शन को लेकर तीखी टिप्पणी की। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने इसे असफल आयोजन करार देते हुए कहा कि कांग्रेस अपने ही कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाने में सफल नहीं हो पा रही है। उनके अनुसार पार्टी के भीतर समन्वय की कमी साफ झलकती है और यही कारण है कि जनता भी ऐसे कार्यक्रमों से दूरी बनाए हुए है।

भट्ट ने यह भी आरोप लगाया कि जिन मुद्दों को लेकर कांग्रेस सड़कों पर उतरी है, वे वास्तविक जनहित से अधिक राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हैं। उन्होंने दावा किया कि राज्य सरकार कानून व्यवस्था और विकास कार्यों पर गंभीरता से काम कर रही है, जबकि विपक्ष निराधार आरोपों के सहारे माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।

कांग्रेस का पक्ष: “जनता की आवाज”

दूसरी ओर कांग्रेस नेताओं ने प्रदर्शन को जनता के आक्रोश का प्रतीक बताया। हरक सिंह रावत ने कहा कि प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर लोगों में असंतोष है। हत्या, लूट और अन्य आपराधिक घटनाओं को लेकर सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शन में आम नागरिक भी बड़ी संख्या में शामिल हुए।

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कांग्रेस का कहना है कि उनका उद्देश्य राज्य में जवाबदेही सुनिश्चित करना और जनहित के मुद्दों को उठाना है। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार जनता के मूल सवालों से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। हालांकि भीड़ की वास्तविक संख्या को लेकर उठे सवालों पर कांग्रेस ने कोई स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं रखा।

राजनीतिक संदेश और चुनौती

विश्लेषकों की राय में यह कार्यक्रम कांग्रेस के लिए अवसर भी था और परीक्षा भी। एक ओर पार्टी आगामी चुनावों से पहले अपनी ताकत दिखाना चाहती थी, वहीं दूसरी ओर संगठनात्मक एकजुटता पर भी नजरें टिकी थीं। प्रदेश नेतृत्व में कई चेहरे सक्रिय हैं, लेकिन सामूहिक रणनीति की स्पष्ट झलक इस आयोजन में पूरी तरह दिखाई नहीं दी।

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भाजपा ने इसे कांग्रेस की आंतरिक कमजोरी का उदाहरण बताते हुए कहा कि सरकार विकास, आधारभूत संरचना और कानून व्यवस्था पर काम कर रही है। पार्टी का दावा है कि जनता सरकार की नीतियों के साथ खड़ी है और विपक्ष के आरोप राजनीतिक निराशा से प्रेरित हैं।

सियासत की दिशा

राजभवन घेराव के बहाने प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस इसे जनसमर्थन का संकेत बता रही है, जबकि भाजपा इसे महज औपचारिक विरोध करार दे रही है। मौजूदा तस्वीर में यह साफ दिखता है कि आयोजन ने विपक्ष की मौजूदगी दर्ज तो कराई, लेकिन व्यापक जनलहर का स्पष्ट संदेश देने में पूरी तरह सफल नहीं रहा।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस आयोजन से क्या रणनीतिक निष्कर्ष निकालती है और भाजपा इसे किस तरह राजनीतिक रूप से भुनाती है। फिलहाल इतना तय है कि इस कार्यक्रम ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां शक्ति प्रदर्शन से ज्यादा संगठनात्मक मजबूती पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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