राजधानी देहरादून में पार्किंग की समस्या वहीं बढ़ती वाहनों की भीड़ सीमित जगह और जाम-जंजाल को मद्देनज़र रखते हुए राज्य सरकार ने एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट शुरू किया था। शहर के बीचो-बीच एक “ग्रीन बिल्डिंग” (हरित भवन) का निर्माण किया जाना था जिसमें करीब 800 से अधिक वाहनों की पार्किंग की सुविधा प्रस्तावित थी। इतना ही नहीं एक ही छत के निचे राज्य के सभी बड़े दफ्तर भी इस बिल्डिंग में आएंगे।यह प्रोजेक्ट इस तरह डिजाइन किया गया था कि शहर के पार्किंग निर्वाह (parking infrastructure) की समस्या को कम किया जा सके शहर में पार्किंग के लिए गलत जगहों पर खड़ी होने वालों की संख्या घटे जमानुमा अव्यवस्था में कमी आए और भवन का स्वरूप “ग्रेस और ग्रीन” हो यानी ऊर्जा-साक्षरता पर्यावरण-मित्रता (green building certification) की ओर संकेत। प्रारंभ में यह तय था कि निर्माण कार्य 2025 तक पूरा हो जाएगा लेकिन अब हालात यह हैं कि अब तक लगभग केवल 30 प्रतिशत काम ही पूरा हुआ है इसका अर्थ है कि 70 प्रतिशत से अधिक काम अभी बाकी है।निर्माण की गति अत्यंत धीमी रही है खुदाई का काम अभी भी चल रहा है और भवन का लगभग केवल आधार-स्तराँत ही तैयार हुआ है। इससे यह प्रश्न उठता है कि आखिर इस बड़े सार्वजनिक निवेश को लेकर किसकी जवाबदेही है।

लागत लाभ और देरी का आर्थिक नुकसान
प्रोजेक्ट की प्रारंभिक लागत-अनुमान 188 करोड़ से ₹206 करोड़ के बीच थी वर्तमान स्थिति में देरी से लागत और अधिक हो जाएगी जितनी देरी होगी उतना खर्च बढ़ने का जोखिम होगा। प्रोजेक्ट के पूरा होने पर शहर को निम्नलिखित लाभ मिलने की आशा थी
पार्किंग संकट में कमी: शहर केंद्र में एक बड़ी सुव्यवस्थित पार्किंग सुविधा से अव्यवस्थित पार्किंग और जाम में कमी आएगी।
रास्तों व सार्वजनिक स्थानों पर वाहन-भिड़ाव में कमी: वाहन पार्किंग के लिए गलत स्थानों पर खड़े होने से निकलने वाला समय तथा परेशानी कम होगी।
हरित भवन (green building) मॉडल से पर्यावरण लाभ: कम ऊर्जा-उपयोग, बेहतर वेंटिलेशन, पर्यावरण-सक्षम निर्माण से स्थायीता (sustainability) बढ़ेगी।
शहर-छवि में सुधार: स्मार्ट-सिटी के अनुरूप इंफ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण बनेगा, जिससे शहर की छवि बेहतर होगी।
सभी दफ्तर एक ही बिल्डिंग के नीचे आ जायेंगे।लेकिन वर्तमान देरी के कारण ये लाभ धुंधले नजर आ रहे हैं। साथ ही ठेकेदार, विभाग और राज्य-सरकार की ओर से देरी पर जिम्मेदारी-लेने की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
इसी परियोजना के निर्माण क्रम में यह बात सामने आई है कि मशीनों से मिट्टी निकालने (खोदने) की अनुमति सविन बंसल (जिलाधिकारी देहरादून) द्वारा जारी की गई थी। यह अनुमति जून महीने की है जबकि आज वर्तमान में नवम्बर है और अभी भी फाउंडेशन (भवन की नींव) खोदने या किसी दिवार को सपोर्ट देने का काम चल रहा है। यानी अनुमति मिलने के बाद भी काम धीमी गति से हुआ है। इस बीच यह सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या ठेकेदार-संस्था को पर्याप्त समय-सीमा दी गई थी क्या निरीक्षण-प्रक्रिया सक्रिय थी और क्या देरी के कारणों का आकलन हुआ है ?
जिम्मेदार-पक्ष और आगे का रोडमैप
स्थानीय विधायक खजान दास ने निर्माण स्थल का निरीक्षण किया और कार्यदायी संस्था की लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने ठेकेदार को अनुबंध निरस्त करने की चेतावनी दी है यदि समय-सीमा का उल्लंघन जारी रहा।
विभागीय अधिकारियों तथा स्मार्ट सिटी प्रभारी को निर्देश दिए गए हैं कि कार्य गति बढ़ाई जाए अब समय आ गया है कि पारदर्शिता के साथ यह सार्वजनिक किया जाए कितने प्रतिशत काम हुआ है शेष राशि कितनी बकाया है ठेकेदार-संस्था ने अब तक कितनी राशि ली है और नए लक्ष्य-समय क्या है इन सभी पहलुओं के बारे में विधायक ने रिपोर्ट भी मांगी है.इसके साथ ही उन्होंने कहा की वो इस बारे में सीएम धामी से भी बात करेंगे।
