उत्तराखंड में रविवार की सुबह थी। बच्चे परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, घर वाले टेंशन में थे और सोशल मीडिया वाले फुल मूड में थे आज तो मज़ा आएगा, कुछ न कुछ बवाल मिलेगा!
इधर पुलिस और एसटीएफ दिन-रात जागकर पहले ही हाकम सिंह जैसे “पेपर महारथी” को सलाखों के पीछे डाल चुकी थी। मतलब, इस बार पेपर से पहले ही असली खिलाड़ी आउट कर दिया गया था। लेकिन… राजनीति नाम की चीज़ भी कोई कमाल है जनाब!
जैसे ही परीक्षा शुरू हुई, बाहर वाले लोग बर्फ़ पिघलने से पहले ही गर्म चाय की तरह बुदबुदाने लगे
“अरे देखो, कुछ सवाल बाहर आ गए!”
अब भई, ये सवाल कौन से थे, कितने थे, कब आए, किसके पास पहुँचे इसकी किसी को खबर नहीं। लेकिन राजनीति का पेट तो बिना नमक-मिर्ची वाली खिचड़ी से भी भर जाता है। बस मौके की तलाश चाहिए।
पुलिस और सरकार पर तीर चलने लगे। किसी ने कहा, “ये नाकामी है!”
तो किसी ने तंज कसा, “नकल-विरोधी कानून का क्या हुआ?”
अब हकीकत ये है कि कानून लागू है, पुलिस कार्रवाई कर रही है, गुनहगार पकड़े जा रहे हैं। लेकिन विरोधियों को इससे क्या लेना? उनका काम तो बस “हल्ला-ओर बावली ” करना है। जैसे शादी में बाराती से ज्यादा काम डीजे वाले की आवाज़ करती है, वैसे ही राजनीति में काम से ज्यादा बवाली शोर करता है।
पुलिस पर सवाल उठाने वाले भूल जाते हैं कि अगर पेपर से पहले ही गिरफ्तारी न होती तो वही लोग कहते “पुलिस सो रही थी!”
और अब जब पुलिस ने पहले ही एक्शन ले लिया, तो वही कहते हैं”देखो, फिर भी गड़बड़!”
मतलब, इनकी सोच उस पड़ोसी जैसी है जो चाहे आप शादी में हलवा खिलाओ या समोसा, बोलेगा”थोड़ा फीका है!”
असलियत ये है कि सरकार और पुलिस दोनों नकलखोरों पर सख्ती से एक्शन ले रहे हैं। पेपर माफिया चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, उनके दिन अब लद गए हैं। लेकिन कुछ लोगों को ये रास नहीं आता, क्योंकि अगर सब ठीक रहा तो उनकी राजनीति की दुकान पर ताला लग जाएगा।
तो कहानी का निचोड़ ये हुआ कि
पेपर लीक से लड़ाई सरकार और पुलिस की प्राथमिकता है। विरोधी बस तवा गर्म देखकर अपनी रोटी सेंक रहे हैं। और जनता समझदार है, उसे पता है कि जो दिन-रात मेहनत कर रहा है, वही असली खिलाड़ी है.बाकी तो बस “कमेंट बॉक्स के हीरो” हैं।
